Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - Printable Version

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RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

जिस्म की प्यास--7

गतान्क से आगे……………………………………

रमेश ने कहानी बनाई कि मैं सिर्फ़ 14 साल का था जब मैं अपने मामा के घर रहने गया था और जब भी

मामा काम के लिए जाते थे मेरी मामी मुझे बहला फुसला के कभी डरा के ब्लॅकमेल करती थी...

और कभी तो जब मामा सोते थे तब मेरे रूम में आके चुद्वाती थी. रमेश ने देखा अब उसका बॅलेन्स ख़तम

होने वाला है और वो परेशान हो गया. उसने अगला मैसेज लिखा देखो मैं जानता हूँ तुम मुझसे मिलने

नहीं वाली मगर जब तुम नया नंबर लोगि भोपाल में तो याद से मुझे अपना नंबर सेंड करना. बाइ नेहा...

डॉली ने भी उदास होके मैसेज लिखा "ठीक है कर्दुन्गि... आज तुमसे बात करके अच्च्छा लगा. बाइ!!!

डॉली ने घड़ी देखी कि रात के 3 बज रहे थे. उसने चद्दर अपने मुँह पे डाली और आँख बंद करके सोने लगी.

उसको बस रमेश की बातें रंगीन याद आ रही थी मगर कुच्छ समय के बाद वो गहरी नींद में सो गयी.

जब गाड़ी भोपाल पहुचने लगी तो अपने समान में नारायण ने एक सूटकेस कम पाया...

आस पास देखने के बाद भी वो सूटकेस नहीं मिला... उस बक्से मे डॉली के कपड़े और बाकी ज़रूरी समान था....

डॉली को इस बात से बहुत दुख हो रहा था... ऐसा नहीं था कि उस बक्से में सारे नये कपड़े थे मगर अब

उसके पास सिर्फ़ एक-दो जोड़े कपड़े ही रह गये थे.... उस चोर को डॉली मन में गालिया देने लगी...

नारायण ने डॉली को तस्सली देते हुए कहा कि तुम नये कपड़े ले लेना और ये सुनके डॉली के चेहरे पे हल्की सी

खुशी च्छा गयी... फिर नारायण और डॉली जब स्टेशन के बाहर आए तो एक आदमी उनका इंतजार कर रहा था...

उसके हाथ में एक बोर्ड पे नारायण का नाम लिखा हुआ था. नारायण उसके पास गया और उससे बात करी.

उसने अपना नाम अब्दुल बताया और कहा कि वो उनका ड्राइवर है. अब्दुल ने दोनो का समान स्कॉर्पियो गाड़ी

में डाला और उनको घर ले गया. नारायण शहर से काफ़ी परिचित था मगर फिर भी इतने सालो

से यहाँ आया नहीं था. उसे भोपाल काफ़ी अलग लगा मगर उसकी नयी गाड़ी जो स्कूल की तरफ से उसे मिली थी वो

काफ़ी नयी थी... नारायण ने अब्दुल को बक्से के खोने के बारे में बताया और उसे शाम को

मार्केट ले जाना के लिए बोल दिया... कुच्छ देर बाद जब गाड़ी उल्टे एक गली में मूड के रुकी...

उस गली में बहुत सारी कोठिया बनी हुई थी... अब्दुल ने नारायण और डॉली को उनका नया घर दिखाया...

डॉली ने सोचा था कि उन्हे एक फ्लॅट मिलेगा मगर वो पूरी कोठी देख कर दंग रह गयी. कोठी बाहर से काफ़ी बड़ी

लग रही और वहाँ एक छोटा सा गार्डेन भी था. जब वो अंदर गये तो घर पूरी तरह से सॉफ और फर्निश्ड था.

घर में 3 बड़े कमरे थे 2 बाथरूम किचन और ड्रवोयिंग रूम था. अब्दुल समान रखके गाड़ी लेगया.

नारायण और डॉली इस घर को देख कर काफ़ी खुश हुए. नारायण और डॉली ने अपना अपना समान अपने

पसंदीदा कमरो में रख दिया. दोनो कमरो में टाय्लेट भी थे तो किसी को कोई तकलीफ़ भी नहीं थी. दिक्कत यही थी

कि डॉली का रूम ड्रॉयिंग रूम के साथ लगा हुआ था और नारायण का उसके दूसरी ओर था.

डॉली ने नारायण को बोला "पापा मैं नहाने जा रही हूँ आप भी फ्रेश हो जाइए फिर नाश्ते का सोचते है" नारायण ने कहा "मैं पहले अपना समान रख लू फिर नहा लूँगा."

ये सुनके डॉली अपने कमरे में गयी और उसे अंदर से बंद कर लिया और अपने कमरे की खिड़की पे परदा खीच दिया.

उसके कमरे की अलमारी में बहुत बड़ा शीशा था और उसमें देखक उसने अपनी हरी टी शर्ट को उतारा और

साथ ही में अपनी नीली जीन्स उतारी. फिर उसने अपना ब्रा का हुक खोला और अपनी काली पैंटी उतार दी. डॉली के लंबे

बाल उसके स्तनो को ढक रहे थे. वो नीचे झुकके अपने सूट केस में से कपड़े निकालने लगी. उसने पीला

सलवार कुरती निकाला और उसके सफेद ब्रा पैंटी. जैसे ही वो उठने लगी उसने बड़े से शीशे में अपने हिलते हुए स्तनो

और हल्की गुलाबी चूत को देखा. 2 सेकेंड के लिए वो रुक गयी और फिर नहाने चली गयी. जैसे ही उसने शवर

खोला तो ठंडा पानी तेज़ी से उसके बदन पे गिरने लगा. वो अपने बदन पे हाथ फेरने लगी. उसे ठंडा पानी इतना

अच्छा लगा इतने लंबे सफ़र के बाद. उसने अपने बदन पे साबुन लगाया और उसको सॉफ करके अपने बदन को पौछ लिया.

डॉली बाथरूम के बाहर आ गयी और फिरसे अपने नंगे बदन को शीशे में देखने लगी. उसने फिर कपड़े पहने और अपने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया. उसको ध्यान आया कि उसके गंदे कपड़े सूट केस के उपर पड़े हुए है. उसने वो

उठाया और बाथरूम में टाँग दिए. उसने पहले अपनी काली ब्रा और पैंटी टांगी और फिर उसने उपर अपनी जीन्स और टी शर्ट.

ये काम करके वो बाहर निकली अपने बालो को तौलिए से सुखाते हुए. "पापा आप अभी भी गये नहीं....

जल्दी जाओ नहा के आओ मुझे प्यास लग रही है." नारायण उठा और अपने बाथरूम में नहाने चला गया.

थोड़ी देर के बाद दरवाज़े पे नॉक हुआ और डॉली ने दरवाज़ा खोल दिया. वहाँ एक लगभग 30 साल का लंबा

हटता खट्टा आदमी खड़ा था हाथो में गुलदस्ता लिए. डॉली ने पूछा "जी आप कौन" आदमी ने कहा "जी मेरा नाम

सुधीर है मैं नारायण सर से मिलने आया हूँ. पीछे से अब्दुल आया कुच्छ समान लेके और बोला

"छोटी मेमसाब ये सुधीर साब है स्कूल से आए है आपके पापा का स्वागत करने". सुधीर और अब्दुल ने

डॉली के हाथ में तौलिया देखा और समझ गये कि अभी ये नहा के निकली है. डॉली ने दोनो को अंदर बुला के

बिठाया और बोली "अभी पापा तो नहा रहे है वो थोड़ी में निकलने वाले होंगे."

"कोई नहीं हम इतनेज़ार करलेंगे आप ये अब्दुल के हाथ से नाश्ता ले ले लीजिए". डॉली का चेहरे पे नाश्ता सुनते

ही मुस्कान आ गयी और वो उसे लेके किचन ले गयी. कुच्छ ही देर में सुधीर किचन में आया और डॉली

को खाना निकालते देख खड़ा हो गया. डॉली एक दम से पलटी और डर गयी.

सुधीर ने कहा "सॉरी मैने आपको डरा दिया मुझे आक्च्युयली बाथरूम यूज़ करना था". डॉली मुस्कुराते हुए बोली "जी कोई नहीं". डॉली सुधीर को अपने कमरे के बाथरूम लेगयि और

शर्मिंदा होके बोली "सॉरी थोड़ा गीला है बाथरूम" सुधीर मुस्कुरकर अंदर चले गया.

डॉली वापस किचन चली गई और उसे एक दम से अपने गंदे कपड़े याद आए जो टाय्लेट के दरवाज़े पे

टाँगे हुए थे. सुधीर ने अपनी ज़िप खोली और पिशाब करने लग गया. पिशाब करते हुए उसने टाय्लेट के चारो

ओर देखा. दरवाज़े की तरफ कपड़े टँगे हुए देख के वो मचल गया. जैसे पिशाब आनी बंद हुई

उसने अपने हाथ से डॉली की जीन्स और टी-शर्ट को छुआ और हल्के से हटाने पे उसे एक काला स्ट्रॅप सा दिखा.

जब उसने कपड़े निकाले तो उसने काली ब्रा और पैंटी देखी. उन्हे देख के ही वो सूँगने लग गया.

एक महकती पसीने की खुश्बू आ रही थी. डॉली की पैंटी अभी भी हल्की सी नम थी. सुधीर ने ब्रा और पैंटी को

थोड़े समय अपने काले लंड पे रगड़ा. जब उसे लगा वक़्त ज़्यादा हो गया तो उसने कपड़े वैसे ही टाँग दिए

और टाय्लेट से निकला. जब वो कमरे के बाहर आया तो उसने नारायण को देखा और हाथ मिलाने चला गया. नारायण और उसने काफ़ी देर बात करी स्कूल भोपाल और इस घर के बारे में. सुधीर ने कहा सर अगर आप चाहे तो स्कूल

को अभी देख सकते है. नारायण ने भी ठीक समझा और तीनो निकलने लगे. नारायण ने डॉली को कहा

कि वो खाना आके ख़ालेगा. जब ये तीनो चले गये तो डॉली ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और सीधा

अपने टाय्लेट में गयी. कपड़े उसी जगह टँगे हुए थे.. उसको लगा कि वो खमखा ज़्यादा सोच रही थी. शाम के कुच्छ 5 बजे थे नारायण ने डॉली को फोन करके कहा कि वो सुधीर जी के साथ है अभी तो वो

नहीं जा पाएगा मार्केट... फिर उसने कहा कि मैने अब्दुल को भेज दिया है वो तुम्हे ले जाएगा गाड़ी में और

वापस छोड़ भी देगा तुम जल्दी से तैयार हो जाओ.... डॉली के पास सिर्फ़ एक लाल टॉप और एक सफेद स्कर्ट थी पहेन्ने

को तो उसने वोई पहेन लिया.... लाल टॉप उसके कंधो को ढक रहा था और उसकी लंबाई भी ठीक ठाक थी...

उसके घुटने उस सफेद स्कर्ट की लंबाई की वजह से ढके हुए थे... उसने नीचे एक सफेद हील वाली सॅंडल

पहेन ली थी... .. अच्छे से बाल को कंघी करके और उनको क्लिप से बाँध वो अब्दुल का इंतजार करने लगी....

काफ़ी देर हो गयी थी और अब्दुल का कोई पता नहीं था.. मोबाइल भी ऑफ था और इस बात से उसको गुस्सा आ रहा था...

फिर तकरीबन 5:45 घर की घंटी बजी और डॉली सोफे से उठ कर दरवाज़ा खोलने गयी... अब्दुल वहाँ खड़ा हुआ था

और डॉली को देखकर ही उसे माफी माँगने लगा... डॉली ने उसको कुच्छ नहीं बोला और अपना पर्स लेके

स्कॉर्पियो की बीच वाली सीट पे बैठ गयी... अब्दुल भी गाड़ी में बैठा और गाड़ी चलाने लगा...

अब्दुल दिखने में मान लीजिए राजपाल यादव जैसे था लेकिन उम्र में उसके पापा के जितना ही शायद उनसे 2-3 साल

बड़ा भी हो सकता था... कपड़ो में सदाहरण शर्ट पॅंट पहेनता था मगर तमीज़दार लगता था....

डॉली अंदर ही अंदर खुश हो रही थी कि वो स्कॉर्पियो गाड़ी में एक मालकिन की तरह बैठी हुई थी....

अब्दुल बीच बीच में उसको जगहो के बारे में बता रहा था जिसे वो बड़ी गौर से सुन रही थी...

कुच्छ आधे घंटे के बाद अब्दुल ने गाड़ी रोकदी... अब्दुल ने डॉली को बताया कि ये यहाँ की न्यू मार्केट है आपको

यहा पर काफ़ी कुच्छ मिल जाएगा.... डॉली को लगा कि अब्दुल जी को तंग करना ठीक नहीं रहेगा तो वो अपने

आप ही चली जाएगी....

डॉली गाड़ी से उतरी और मार्केट के अंदर घुसी... मार्केट में ठीक ठाक भीड़ थी तो डॉली सम्भल

सम्भल के दुकाने देखने लगी... बीच बीच में किसी से कंधे टकरा रहे थे या हाथो से हाथ च्छू रहा

था मगर डॉली ने उन बातो पे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया... जैसे कि आप लोग जानते हो कि लड़कियों को अकेला

मार्केट में छोड़ दो तो उन्हे वहाँ से निकालना मुश्किल हो जाता है तो वोही हाल डॉली का भी था... वो 3 दुकान

में जाके एक चीज़ ले रही थी... समय ज़्यादा होने की वजह से उसके पास अब्दुल के 1-2 बारी कॉल भी आ गया था...

कुच्छ 8:30 बज गये थे और भीड़ अब कम होने लगी थी... डॉली ने काफ़ी समान खरीदलिया था जिसको अब

वो ज़्यादा देर तक पकड़के घूमने नहीं वाली थी तो उसने अब्दुल को कॉल करके मार्केट के अंदर बुलाया...

अब्दुल से मिलके उसने सारा समान उसको पकड़ा दिया और उसे आधा घंटा और माँग लिया...

अब्दुल ने उसको बताया की 9:15 के बाद मार्केट बंद होजाएगी तो आप जल्दी करिए गा... डॉली ने उसकी बात को सुनके

भी अनसुना कर दिया... अब वो खाली हाथ थी और सबसे ज़रूरत मंद चीज़ तो उसने ली नहीं थी...

फिर वो एक स्टोर के अंदर गयी जोकि ठीक ठाक लग रहा था... स्टोर का नाम गुप्ता आंड सोंस था...

अंदर जाते ही उसको एक सेल्समन दिखा जो डॉली को देख कर ही बोला "आइए मेडम क्या दिखाऊ आपको... टॉप्स? स्कर्ट?जीन्स?

डॉली ने उसकी बात को बीच में काटते हुए धीमी आवाज़ में कहा "मुझे इन्नर वेर चाहिए...'

वो सेल्समन मुस्कुराते हुए बोला "मॅम उसके लिए आपको उपर जाना पड़ेगा...."

डॉली ने फिर छ्होटी छ्होटी सीडीओ को देखा और उनपे सम्भल संभलके उपर जाने लगी...

उसे डर लग रहा कि कहीं वो गिर ना जाए... उधर वो सेल्समन डॉली की लहराती हुई स्कर्ट को देख रहा था...

सेल्समन डॉली की हिल्लती हुई गान्ड को देखकर अपने लंड को मसल्ने लगा... जब डॉली उपर पहुचि तो वहाँ

एक 35-40 साल का आदमी खड़ा था... शकल से वो काफ़ी कमीना सा लग रहा था... वो वाला फ्लोर लड़कियों/औरतो

के इननेरवेार से भरा था... काई लड़कियों के पोस्टर लगे हुए थे अलग अलग ब्रा और पैंटी में....

डॉली को देखते वो आदमी बोला "जी मेडम क्या देखना चाहेंगी आप'

डॉली ने बोला "मुझे इननेरवेार देखने थे"

सेल्समन " ब्रा और पैंटी दोनो दिखाऊ"

डॉली बोली " जी दोनो ही..."

सेल्समन ने डॉली के स्तन का आकार देख कर ही अनुमान लगा लिया था कि उसका साइज़ क्या होगा मगर फिर भी उसने

डॉली से पूछा

डॉली ने बोला "34 बी"

डॉली को देखकर वो समझ गया था कि ये मेह्न्गि पार्टी है तो वो थोड़े महँगा इंपोर्टेड ब्रास दिखाने लग गया....

काफ़ी तरीके की क्वालिटी थी वहाँ और कंपनी सिर्फ़ एक ही थी "फ्लॉरल"... इतनी सारी ब्रास को देखकर डॉली का दिमाग़

ही नही चल रहा था... कुच्छ सेमी ट्रॅन्स्परेंट वाली थी कुच्छ स्पोर्ट्स ब्रा थी कुच्छ बिना स्ट्रॅप वाली.....

डॉली को थोड़ा कन्फ्यूज़ देख कर सेल्समन बोला "मेडम आप चाहे तो चेंजिंग रूम में ट्राइ कर सकती है...

इश्स कंपनी की सबसे अच्छी बात ये है कि हर हर माल का साइज़ सेम होता है... अगर 34 लिखा है तो उतना ही होगा..... "

सेल्समन के कहने पर डॉली ने सारी तरीके की ब्रा उठाके ट्राइयल रूम के बारे में पुच्छने लगी....

उस आदमी ने उसे इशारे करते हुए उल्टे हाथ की तरफ जाने के लिए कहा.... ट्राइयल रूम में एक बहुत बड़ा

शीशा लगा हुआ था जिसको देख कर डॉली खुश हो गयी थी... उसने दरवाज़े को बंद कर्दिआ और अपनी टी-शर्ट

उतारके दरवाज़े के हुक पे टाँग दी.... अपनी पीट की तरफ हाथ लेजा कर उसने ब्रा खोलदी और उतारके साइड में

पड़े स्टूल पे रख दी.... डॉली ने अपने आपको शीशे में अधनग्न देखा... उस दुकान में एसी की

वजह से काफ़ी ठंढक थी और जैसी ही डॉली ने अपनी ब्रा उतारी तो उसके रॉगट खड़े हो गये....

उसने नज़र शीशे पे डाली तो उसके चुचियाँ भी काफ़ी सख़्त हो गयी थी... उसने फिर एक काली रंग की स्पोर्टा ब्रा

उठाई और उसको पहेंके शीशे में देखने लगी... वो ब्रा उसको पूरी तरह से फिट हो गयी थी...

उसके मम्मे उसमें पूरी तरह शूरक्षित महसूस कर रहे थे.... फिर उसे उतारने के बाद उसने एक नॉर्मल

वाली सफेद ब्रा पेहेन्के देखी तो वो भी उसके स्तन को अच्छी तरह से ढक रहे थे.... उस ब्रा में नीचे

की तरफ वाइयर लगी हुई थी जैसे की डॉली की अभी वाली ब्रा थी....

फिर उसने आखरी तर्कीके की ब्रा उठाई जिसमे एक गुलाबी रंग सेमी ट्रॅन्स्परेंट लेसी ब्रा उठाई और उसे पहने लिया...

उसको पहनने में उसे थोड़ी सी दिक्कत हुई मगर जब उसने सारे हुक्स लगा दिए तो शीशे में खड़े देखा

उसके स्तन काफ़ी बड़े और गोल लग रहे थे.... सबसे अच्छी बात उसकी ये थी कि वो अच्छा नज़ारा दिखाकर भी चुचियाँ

को छुपा रही थी... ऐसा ब्रा डॉली ने आज तक नहीं पहनी और इस्पे उसका दिल आ गया था... आख़िर में उसने

एक आखरी ब्रा उठाके पहनी जो पूरी तरह से उसे फिट नहीं हो रही थी... डॉली का अब वापिस कपड़े पेहेन्के बाहर

जाके बताने में आलस आ रहा था तो उसने वहीं से उस सेल्समन को बोला जोकि अपने लंड को सहला रहा था

डॉली के बारे में सोचके जोकि उसे कुच्छ कदम दूर नंगी खड़ी थी..."भैया ये सफेद रंग की ब्रा थी ना जिसपे सफेद

डॉट्स से वो फिट नही हो रही है इसका बड़ा वाला साइज़ दो"

सेल्समन बोला "मेडम वो पुश अप वाली ब्रा है आपको अपनी ब्रेस्ट उपर करके पहन्नी पड़ेगी" डॉली के सामने

ना खड़े रहने का उसने पूरा फ़ायदा उठाया और डॉली ये सुनके भी काफ़ी हैरान थी... खैर उसने जैसे तैसे करके

उस ब्रा के हुक लगा दिया मगर फिर उसे अजीब सा दर्द होने लगा..... उसने अपना हाथो से अपनी अपने

मम्मो को ठीक करा... उसकी ठंडी उंगलिया उसकी चुचियाँ को जैसे छुई वो एक दम से हिल गयी...

वो हल्के से एहसास में ही वो गरम हो गयी थी.... उसने शीशे में देखा कि उस ब्रा में स्तन का उपरी हिस्सा

सॉफ दिख रहा था...

उस सेल्समन ने जान के पूछा "मॅम हुक लग गये आपसे??" डॉली को उस सेल्समन की आवाज़ अब थोड़ी पास से सुनाई दी..

उसे लगा कि वो ट्राइयल रूम के बाहर खड़ा ही पुच्छ रहा है... डॉली ने जैसे ही हाँ कहा उस सेल्समन ने फिर कहा

"मॅम आप पैंटी भी ट्राइ करेंगी?? अभी अभी फ्रेश पीस आए है..."

डॉली को पैंटी तो लेनी ही थी तो उसने बोला "अच्छा मैं देखने आती हूँ"

सेल्समन ने बोला "माँ मैं आपको पकड़ा देता हूँ आप खमखा कष्ट करेंगी बाहर निकलने का... मुझे बस 2 मिनट दीजिए"

क्रमशः……………………….


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

जिस्म की प्यास--8

गतान्क से आगे……………………………………

डॉली अपने आपको शीशे में निहारने लगी.. उस पुश अप ब्रा मेवो काफ़ी हसीन लग रही थी...

अपने बालो को खोलके वो उंगलिओ के नाख़ून अपने स्तन के उपरी हिस्से पे चलाने लगी... वो थर्कि सेल्समन उन पैंटी को अपने लंड से लपेट तो नहीं सकता था मगर उनको अच्छी तरह महसूस करकर वो ट्राइयल रूम की तरफ बढ़ा....

सेल्समन चाहता तो था कि वो डॉली को पॅंटीस अपने हाथो से पकड़ाए मगर उपर से फेंकने में ही भलाई थी...

जैसे ही उसने 'मॅम' बोला तो डॉली ने अपने आप ही ट्राइयल रूम का दरवाज़ा खोला और अपना हाथ आगे बढ़ाया...

सेल्समन के चेहरे पे एक लंबी मुस्कुराहट थी... उसने डॉली के हाथ को छुते हुए उसे पॅंटीस थमा

दी और वहाँ से थोड़ा दूर खड़ा हो गया... डॉली ने सबको स्टूल पे रखा और अपनी सफेद स्कर्ट को नीचे उतारा...

. अब वो सिर्फ़ एक पुश अप ब्रा और पैंटी में खड़ी हुई वी थी... उसने अपनी पैंटी को नीचे करा और उसे टाँगो

से निकालने के झुकी तो उसने पुश ब्रा की वजह से बनता हुआ क्लीवेज देखा.... वो अपने आपको वैसे

देखकर थोड़ा शर्मा गयी.... उसकी चूत पर बाल अब ज़्यादा बढ़ गये थे जिनपे खुजली होने लगी...

1 सेकेंड अच्छी तरह खुजाने के बाद उसने पहली पैंटी ट्राइ करी जो उसके नितंभ को पूरी तरह धक रही थी....

वो थोड़ा शर्मा गयी ये सोचके कि उस सेल्समन ने कितनी अच्छी तरह से उसके नितंबो को देखा होगा जो एकदम

सही पैंटी लाके दी....दूसरी पैंटी थोड़ी टाइट थी जिसको पहने की वजह से उसके नितंब थोड़े से दिख रहे थे...

मगर जब उसने अगली पैंटी उठाई तो उन्हे देख कर वो थोड़ा सा हैरान हो गई... उस सेल्समन ने उसे एक काले रंग का

थोन्ग पहनने को दिया था.... डॉली ने मस्ती में उसे पहना और मूड कर अपने नितंब को देखने लगी...

वो काफ़ी उत्साहित हो गयी थी अपनी गान्ड को छुके... हल्के से जब उसने नीचे हिस्से को दबाया तो वो शर्मा गयी.....

वो सेल्समन को समझ आ गया था कि मेडम ने उस थोन्द को भी पहेन ही लिया होगा.... फिर भी उसने पूछा

"मेडम सारी फिट हो रही है ना..." डॉली ने धीमे से हां कहा... फिर उसने अपनी ब्रा आंड पैंटी वापस पेहेन्के

अपने कपड़े पहने और वहाँ से बाहर निकली.... सेल्समन के चेहरे की गंदी मुस्कुराहट देखकर उसे थोड़ा अजीब सा लगा....

खैर फिर उसने सारे ब्रा/पैंटी में अलग अलग रंग ले लिया... आख़िर में उस सेल्समन ने खुद पूछा

(जैसा कि वो चाहती थी) मॅम इसका (थोन्ग) का क्या करू??

डॉली को बहुत चाह थी वो लेने की मगर उसने अभी उसे रहने दिया और वहाँ पैसे देके चली गयी...

उस सेल्समन से रहा नहीं गया और उस थोन्ग को सुंगते सुंगते जिसमें डॉली की खुश्बू बेहद आ रही थी

तकरीबन 10 मिनट तक मूठ मारा....

डॉली ने गाड़ी में बैठके अब्दुल से कयि बारी माफी माँगी और अब्दुल ने भी उसको माफ़ कर्दिआ... कुच्छ 9:30 बजे तक वो पहुच गयी और अपने पापा के साथ खाना ख़ाके जल्दी सो गयी...

उधर दिल्ली में काफ़ी बदलाव आ गया था... शन्नो अब अकेली बिस्तर पर रहती थी अपनी तन्हाइओ में.. उसे सबसे

ज़्यादा दुख इस बात का था कि नारायण के जाने से पहले वो उसे चुदि नहीं.... नारायण के लाख बारी कोशिश करने पर

भी उसने अपने पैर पर कुलहारी मार ली.... ललिता ने अब डॉली का कमरा ले लिया था और वो काफ़ी खुश थी कि आख़िर

कार उसके पास उसका खुद का कमरा है जिसको वो जैसे सजाना चाहे सज़ा सकती है... चेतन के पास भी अब एक पूरा

कमरा आ गया था... मगर दोनो की ज़िंदगी में अधूरापन था... चेतन डॉली के साथ बिताए हुए वो

हसीन पल को भूल नहीं पा रहा था... उनको सोचकर ही उसका लंड खड़ा होने लगता और वो आँखें बंद करके

डॉली को याद करके मूठ मारता... ललिता को चेतन और डॉली के बारे में पता चल गया था...

और ये ख्यालात उसके दिमाग़ में चलता था अब सिर्फ़ वो ही है पूरी दुनिया में जो इतनी साल की होने के बाद भी

चुद्ने का मज़ा नहीं ले पाई.... ललिता को चेतन में कोई दिलचस्पी नहीं थी... उसे वो बिल्कुल भी अच्च्छा नहीं लगता

था और वैसे बात ये थी कि अपने भाई के साथ वो हमबिस्तर नही होना चाहती थी मगर उसकी जिस्म की प्यास

मिटने का नाम ही नहीं ले रही थी...

कुच्छ दिन तक सबकी ज़िंदगी रूखी सूखी चलती रही... फिर एक दिन चेतन ने शन्नो से कहा: मम्मी ऐसा हो सकता है

की कुच्छ दिनो के लिए चंदर यहाँ रहने आ जाए. उसके नाना की तबीयत बहुत बिगड़ी हुई है तो उसके मा बाप

उन्हे देखने ओरिसा जाने वाले है. शन्नो ने कुच्छ देर सोचा और फिर चंदर को घर पे रुकने क लिए इजाज़त देदि.

वो जानती थी चंदर एक अच्छे और अमीर घर का लड़का है और उसकी वजह से ही उसका बेटा स्कूल जाने लग गया है.

शन्नो ने चंदर की मा से बात करके उनको भरोसा दिलाया कि चंदर हमारे साथ बिना किसी परेशानी

से रहेगा और आप बिना चिंता करें ओरिसा जाइए. चंदर काफ़ी खूबसूरत लड़का था और चेतन का

सबसे अच्च्छा दोस्त भी. लंबा कद मज़बूत शरीर और सॉफ गोरा चेहरा की वजह से काई लड़किया उसपे मन ही

मन मरती थी. ललिता चंदर से काई बारी मिली है मगर चंदर कभी भी उसके साथ खुल नहीं पाता था और

यही चंदर की सबसे खराब बात थी. अगर वो चाहता अब तक कयि लड़कियों को पटा सकता था मगर

उसके अंदर हिम्मत नहीं थी. वो मन ही मन लड़कियों के बारे में सोचके मज़े लेता था.

उधर भोपाल में सुबह स्कूल जाने से पहले नारायण ने डॉली को बताया कि 3 दिन में हमारे स्कूल में डिन्नर

रखा गया है हमारे लिए..... स्कूल के सारे लोग अपनी फॅमिली के साथ आ रहे है....

नारायण ने कहा मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी आए और मेरे साथ रहे. ये बोलके नारायण स्कूल के लिए चला गया..... उस दोपेहर दिल्ली में जब ललिता स्कूल से घर आई तो उसने घर की बेल बजाई और घर का दरवाज़ा

चंदर ने खोला. ललिता 2 सेकेंड के लिए कुच्छ बोल नहीं पाई बस चंदर को देखने लगी और वोही हाल

चंदर का भी था. "चंदर तुम यहाँ कैसे आ गये" ललिता ने मुस्कुराते हुए पूछा..

चेतन आया और उसने बोला " आपको बताना भूल गया था... चंदर यहीं रहेगा कुच्छ दिनो के लिए

हमारे साथ क्यूंकी इसके पापा मम्मी ओरिसा गये हुए है"....

ये सुनके ललिता के चेहरे पे मुस्कान आ गयी... फिर सबने साथ में बैठके लंच किया.

चंदर और ललिता आमने सामने बैठे हुए थे और ललिता के चेहरे पे शरारत से भरी हुई मुस्कान

रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. खाना खाने के बाद वो अपने कमरे में चली गयी और

उसे बंद कर लिया. वो सोचने लगी कि अब चंदर घर पे है तो ज़रूर ये दोनो स्कूल नहीं जाएँगे तो

इसका मतलब मुझे भी छुट्टी लेने का प्लान बनाना पड़ेगा. ये सोचते सोचते ललिता बिस्तर पे जाके सो गयी.

जब शाम हो गयी तो उसको दरवाज़े पर खटखटाने की आवाज़ आई. वो अपनी नींद की भरी हुई

आँखों में उठी और दरवाज़ा खोला.

चेतन ने मज़ाक में बोला "क्या अफ़ीम ख़ाके सो जाती हो आप" ये सुनके ललिता हँसने लग गयी...

फिर चेतन ने कहा "सुनो मैं और चंदर बाहर जा रहे है आपको कुच्छ चाहिए तो नही ललिता ने मना कर दिया.

कुच्छ देर बाद जब वो अपने मम्मी के कमरे में गयी तो शन्नो ने बोला "ललिता बेटा क्या कर रखा है

ये तूने. मैने तुझे दोपेहर में बोला था ना के वॉशिंग मशीन ऑन कर दिओ"

ललिता ने माफी माँगते हुए कहा "ओह्ह भूल गयी थी मम्मी"

शन्नो बोली "भूल गयी थी की बच्ची कल क्या पहेन के जाएगी अगर कपड़े ही ना धुले हुए हो" ललिता मज़ाक में बोली

"कोई बात नहीं कल में बिना कपड़ो के चली जाउन्गि ना."

हॉ गंदी लड़की शन्नो ने ललिता के कंधे पे हल्के से मारते हुए कहा. फिर शन्नो ने कहा

"अच्च्छा सुन अपना कमरे को अंदर से बंद करके ना सोया कर सिर्फ़ भेड़ दिया कर". ललिता ने पूछा क्यूँ.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

फिर शन्नो ने बोला "बेटा चेतन के कमरे के टाय्लेट की सीट टूटी हुई है ना... तो अब चेतन का दोस्त आया हुआ

है तो अच्छा नहीं लगता कि तू अपना कमरा बंद करके बैठी रहें. और यहाँ मेरे कमरे के टाय्लेट

इस्तेमाल करने में उसको झिझक होगी तो वो तेरा कमरे का यूज़ करलेगा."

ललिता ने भी उसमें हामी भरी. फिर ललिता ने कहा "मम्मी कल और परसो में इंस्टीट्यूट नही जाना चाहती

क्यूंकी जो भी वो पढ़ा रहे है वो मुझे वैसे ही आता है और फिर सॅटर्डे सनडे है तो चार दिन की छुट्टी मिल जाएगी." शन्नो ने कहा "ठीक है जैसे तुम्हारी मर्ज़ी." ललिता ने शन्नो के गाल को चूमा और अपने कमरे में नहाने चली गयी.

उसने अलमारी में से पीली ब्रा और काली चड्डी निकाली और उपर पहनने के लिए एक लाल टी-शर्ट और

पिंक कॅप्री ट्राउज़र निकाला. उसकी टी-शर्ट थोड़ी सी टाइट थी और कॅप्री ट्राउज़र उसके घुटनो तक था.

वो अपने सारे कपड़े लेके बाथरूम में घुस गयी और नहाने का पानी गरम करके शवर चला दिया.

उसने अपने कपड़े उतारके हॅंडल पे टाँग दिए और शवर के नीचे खड़ी हो गयी.

कुच्छ ही सेकेंड में उसका बदन गीला हो चुका था...फिर ललिता ने हरे रंग ला सिंतोल साबुन उठाया

उसको हल्का सा गीला करके अपने पेट पर मलने लगी... पेट से ले जाकर वो अपनी जाँघो पे ले गयी...

अपनी उल्टी टाँग टाइल्स के सहारे रखके उसपे साबुन लगाने लगी फिर वैसे ही सीधी टाँग पे करा....

फिर उसने साबुन को और गीला करा और मम्मो पे उसको फेरने लगी.... फिर पीठ पे लेजाकर अपनी गान्ड पे ले गयी...

जब उसके बदन पे पूरा साबुन का झाग फैल गया तो उसने अपने काले बालो पे शॅमपू लगा लिया...

उसके हाथो में इतना झाग था कि अब वो अपने मम्मो पे हाथ फेरने लगी...

उसका बदन हद से ज़्यादा चिकना हो गया था... एक अजीब मज़ा सा आ रहा था उसको...

फिर उसने दरवाज़ा पे खटखट सुनी और चंदर की आवाज़ सुनके वो सेहेम गयी.... ललिता ने धीमे से बोला "मैं हूँ...नहा रही हूँ" चंदर ये सुनके वहाँ से चला गया अपने दिमाग़ में ललिता को नहाते हुए सोचकर...

ललिता ने फिर जल्दी से अपने हर अंग को पानी से सॉफ करा और टवल से पौछा और अपने बालो को सुखाने लगी.

फिर उसने टवल को अपने सिर पे बाँध दिया और कपड़े पहेन्ने लगी. सबसे पहले उसने पैंटी पहनी जिसने

उसकी नरम गान्ड पूरी तरह से धक दिया और फिर उसने उसके उपर अपनी कॅप्री पहेन ली. फिर उसने अपने ब्रा के '

हुक लगाए और अपनी लाल टी-शर्ट पहेन ली. वो अपने गंदे कपड़े उठाने लगी मगर फिर उसने जानके

वही छोड़ दिए ताकि चंदर उन्हे देख पाए. जब ललिता बाहर निकली तो 2 मिनट के अंदर ही चेतन टाय्लेट चला गया.

जब वो वापस आया तो उसने फ़ौरन ललिता को बोला कि अपने गंदे कपड़े धोने के लिए डाले हुए हैं.

ललिता ने मायूस होके वो कपड़े हटा दिए और अपने कमरे में बैठके गाने सुनने लगी.

रात में खाना लगा कर शन्नो ने सबको बुलाया खाने के लिए. खाने के वक़्त सबने बड़ी बातें

की हस्सी मज़ाक किया. चंदर भी थोड़ा खुल गया और खुश होके शन्नो और ललिता से बात करी.

बहुत रात में अचानक सोते वक़्त चंदर की आँख खुली. उसने देखा कि चेतन गहरी नींद में सो रहा है.

उसने पानी पीने के लिए साइड में हाथ बढ़ाया मगर बॉटल में पानी ख़तम हो चुका था.

उसका गला इतना सुख गया था कि वो अब और पानी के बगैर नहीं रह सकता था. वो उठ कर गया कमरे

के बाहर बड़ी सम्भल के हाथ में मोबाइल लेके. किसी तरह वो किचन में पहुचा और पूरा एक

ग्लास भरके पानी पीया. अब उसको लगा कि अब लगे हाथ टाय्लेट भी चले जाता हूँ. वो पहले चेतन की मम्मी

के रूम की तरफ्त बढ़ा क्यूंकी वो ज़्यादा नज़दीक था किचन से मगर उसको लगा कि आंटी ने शायद बंद

कर रखा होगा कमरा. फिर वो ललिता के रूम की तरफ बड़ा. उसने आहिस्ते से दरवाज़ा खोला. पूरे रूम में

अंधेरा था और उसे कुच्छ नहीं दिखाई दे रहा था. उसने टाय्लेट की लाइट ऑन करी और जैसे उसने दरवाज़ा

खोला तो उसकीनज़र ललिता के चेहरे पे पड़ी. सोते हुए वो जैसे एक परी सी लग रही थी जैसे चाँद उसके खूबसूरत

चेहरे पे रोशनी डाल रहा हो. उसने 1 मिनट ललिता को देखा फिर वो टाय्लेट चले गया. फिर चंदर किसी तरह

चेतन के कमरे तक पहुचा और जाके बिस्तर पे लेट गया. उसका ध्यान सिर्फ़ और सिर्फ़ ललिता के उपर रह गया था. काफ़ी समय के बाद उसकी आँखें बंद हो गयी और वो गहरी नींद में सो गया.

सुबह के 10 बज रहे थे शन्नो जल्दी से चेतन के कमरे में गयी और उसको उठाके कहा "बेटा बुआ की तबीयत

खराब है काफ़ी और उन्हे हॉस्पिटल लेके गये है... मैने खाना बनाके रखा हुआ है तुम लोग खा लेना.

मैं कोशिश करूँगी शाम तक आ जाउ". चेतन बिस्तर से उठा और जाके घर का दरवाज़ा बंद कर दिया.

उधर दूसरी ओर भोपाल में नारायण अपने कॅबिन में बैठा हुआ था. उसने अपने सेक्रेटरी सुधीर को

अपने कमरे में बुला के बोला कि अब्दुल को भेज दो मेरे पास.

सुधीर ने कहा "सर आपने ही तो अब्दुल को सुबह भेज दिया था स्कूल के काम से. आप शायद भूल गये होंगे".

नारायण ने बोला "हां यार मैं तो ये भूल ही गया. खैर छोड़ो". सुधीर ने पूछा "सर कुच्छ काम था

तो बताइए. हम कर देते हैं". नारायण ने कहा "बात ऐसी है कि आज मैं अपना खाना लाना भूल गया हूँ.

लेकिन अब मैं कॅंटीन का ही खाना खा लूँगा". सुधीर ने झट से बोला "सर क्या बात कर रहे है आप.

मुझे भी अभी अपने घर जाना था. मैं एक फाइल भूल गया घर पे तो आप

कहें मैं आपका टिफिन भी ले आउन्गा". नारायण ने खुशी से बात मान ली सुधीर की.

लेकिन असली बात ये थी कि सुधीर को फिर से डॉली को देखना था फाइल तो बस एक बहाना था.

कुच्छ दोपेहर के 12 बजे तक सुधीर स्कूल से निकला खाना लाने के लिए. वो जब वहाँ पहुचा तो उसने एंटर्रेन्स गेट खोला और घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ गया. बेल बजाते वक़्त उसके गंदे दिमाग़ में आया कि एक

बारी घर की खिड़कियो में से ताका झाकी करता हूँ. उसको पता था कि डॉली का कमरा कौनसा था.

तो वो दबे पाओ घर के पीछे के हिस्से में गया और डॉली की कमरे की खिड़की की तरफ पहुचा.

खिड़की एक नीले पर्दे से धकि हुई थी मगर किस्मत से वो अकेला परदा पूरी खिड़की को धक नहीं

पा रहा था और इसी वजह से सीधे हाथ की तरफ से सुधीर कमरे में झाक पा रहा था....

कुच्छ देर तक डॉली का कुच्छ आता पता नहीं था. सुधीर ने सोचा कुच्छ देर और रुक कर देखता हूँ क्यूंकी

सब्र का फल मीठा होता है. फिर सुधीर की नज़र कमरे के दरवाज़े पर पड़ी जिसमे से डॉली चलकर आ रही थी.

उसके काले घने बाल खुले हुए थे और लॅट उसके चेहरे पे गिर रही थी. सुधीर की नज़र डॉली के

स्तनो से हटकर उसकी लंबी चिकनी टाँगो की तरफ बड़ी..... उसने नीचे सिर्फ़ एक छ्होटी रंग बियरॅंगी शॉर्ट्स पहेन

रखी थी...... उपर भी उसने गुलाबी रंग का पतला सा टॉप पहेन रखा था जिसमें से सॉफ झलक रहा

था कि उसने ब्रा पहेन रखी है...... डॉली एक कुर्सी पे बैठी और अपनी मस्त टाँगो को बेड पे आराम से टिका दिया....

उसकी हाथ में एक छोटी सी काँच की शीशी थी और उसके साथ एक रूई का डिब्बा....

ध्यान से देखने के बाद पता चला कि वो नेल पोलिश हटाने के लिए था.... डॉली झुक के रूई को अपने

टाँगो के नाख़ूने पे लगाने लगी.... काफ़ी देर राक यही सिलसला चलता रहा... अब सुधीर को कुच्छ

और देखने का मन कर रहा था.... फिर डॉली कुर्सी से उठी और टाय्लेट की तरफ गयी है और उसके कुच्छ

सेकेंड्स बाद बाहर आ गयी. अब वो अपनी अलमारी की तरफ बड़ी और उसमें कुच्छ ढूँढ रही थी.

खिड़की के बिल्कुल सामने ही डॉली पीठ करके खड़ी थी. सुधीर की नज़र डॉली की टाइट गान्ड पे गढ़ी हुई.

सुधीर उसको देख कर अपने लंड से खेलने लग गया. जब भी डॉली झुकती तो उसकी गंद और बड़ी हो जाती

और साथ ही सुधीर का लंड भी फरफराने लगता... डॉली ने कुच्छ कपड़े निकाले और फिर सफेद रंग

की ब्रा और पैंटी निकाली अलमारी में से. सुधीर को अंदाज़ा लग गया कि अब नहाने जा रही है.

सुधीर का मन अब प्रार्थना में था कि डॉली उसके सामने ही कपड़े उतारके नंगी होकर नहाने जायें...

नज़ाने क्यूँ डॉली एक ही जगह खड़ी होकर कुच्छ सोचे जा रही थी और सुधीर की वहाँ खड़े खड़े

जान जा रही थी... फिर वो मौका आया जिसका सुधीर को बेहद इंतजार था डॉली ने दोनो हाथो से अपना

पिंक टॉप पकड़ा और उसे उतारने लगी. टॉप को वो उपर तक खीच कर ले गयी मगर उसके बालो में

जाके अटक रहा था और जब वो उसे निकालने की कोशिश कर रही तो उसके मम्मे जोकि काली ब्रा अंदर च्छूपे

हुए हिलने लगे. सुधीर का मन कर रहा था कि अभी हाथ बढ़ा कर डॉली की ब्रा के हुक्स को खोल डाले....

जैसे ही डॉली ने टॉप उतारा उसने अपने हाथ बढ़ाया ब्रा के हुक्स खोलने के लिए मगर फोन की आवाज़ आगाई.

डॉली ने मोबाइल उठाया और बोली "जी पापा.... क्या हुआ.. मैं नहाने जा रही थी" सुधीर को इतना गुस्सा

आया इस समय. डॉली ने जब फोन रखा तो उसने वापस अपना पिंक टॉप पहेन लिया और कमरे से चली गयी.

सुधीर को समझ आ गया था कि नारायण ने डॉली को कॉल करके बोला होगा कि सुधीर खाना लेने आएगा.

सुधीर उदास होता हुआ घर के दरवाज़े की तरफ बड़ा और घंटी बजाई. डॉली ने दरवाज़ा खोला और कहा

"नमस्ते सुधीर जी कैसे है आप"? सुधीर ने कहा "बस ठीक है... 3 दिन के बाद डिन्नर है स्कूल में क्या सोचा है आपने उसके बारे में... क्या आप आएँगी"?? डॉली ने कहा जी ज़रूर आउन्गि.... फिर डॉली ने खाना दिया

सुधीर को और दरवाज़ा बंद कर दिया.

क्रमशः……………………….


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

जिस्म की प्यास--9

गतान्क से आगे……………………………………

उधर दूसरी ओर चेतन, चंदर और ललिता उठ चुके थे. तीनो खाना ख़ाके बैठे थे और काफ़ी बोर

भी हो रहे थे क्यूंकी बत्ती नहीं आ रही थी. फिर तीनो ने सोचा कि कुच्छ खेलते है जिससे वक़्त भी निकल जाएगा.

तीनो ने किसी तरह कुच्छ ना कुच्छ खेलके समय निकाला फिर जब थोड़ी शाम हो गयी थी फिर उनके पास कॉल

आया शन्नो का. शन्नो ने कहा "बेटा ऐसा है कि बुआ की तबीयत काफ़ी खराब तो वो आज हॉस्पिटल में होंगी

और अंकल भी नहीं है यहाँ उनके पास तो आज मैं उनके पास रुकूंगी. तुम लोग कुच्छ बाहर से मंगवा लेना

मैं सुबह आ जाउन्गि घर. जैसे ही फोन रखा चेतन ने चिल्ला के ये सब कुच्छ दोनो को बताया.

जब घर में कोई बड़ा नहीं होता तब बड़े मज़े आते है बच्चो को इसलिए तीनो बहुत ही ज़्यादा खुश थे.

फिर लाइट भी आ गयी तीनो बैठके कोई पुरानी पिक्चर देखने लगे. पिक्चर में एक सीन आया कि शक्ति कपूर

एक लड़की का बलात्कार कर रहा है. उसको देख कर दोनो चेतन और चंदर काफ़ी घबरा गये. दोनो को अपने

कछे में सख़्त लंड को ठीक करना पढ़ा. उधर ललिता भी थोड़ा शरम में मुश्कुरा रही थी.

और फिर से लाइट चली गयी. तीनो ने कहा अब क्या करें यार.. शाम के 7 बज रहे थे और अंधेरा भी

हो गया था. चंदर ने कहा ओये एक गेम खेलोगे. ललिता ने पूछा कैसा गेम. चंदर ने कहा इसको

डार्क रूम कहते है मतलब काला कमरा. चेतन ने पूछा "ये कैसा गेम है... क्या करना होता है इसमें".

चंदर ने कहा "देखो इसमे हम एक कमरे के दरवाज़े और खिड़कियो को पूरी तरह से ढक देंगे

ताकि कहीं से भी रोशनी ना आए. फिर कोई दो इस रूम में छुपेन्गे कहीं पे भी और कोई एक इन को दोनो पकड़ेगा कमरे के अंदर....जैसे छुपन च्छुपाई में होता है. और हां जिसको पहले पकड़ा जाएगा फिर उसकी बारी होगी ढूँढने की....और हम ऐसा भी कर सकते है कि थोड़े से जाल बिछा दे". चेतन ने पूछा कैसे जाल.

चंदर ने कहा "देख हम दरवाज़े के पास बॅट रख देंगे तो जैसे ही कोई बंदा आएगा अंदर दरवाज़ा

खोलकर तो उसके उपर वो गिरे गा. इससे और मज़े आएँगे गेम में". ललिता और चेतन दोनो ने

झट से हां कह दिया. खेलना शुरू करा. सबसे पहले ढूँढने की बारी ललिता की थी.. और उसको बहुत

समय लगा दोनो को ढूँढने के लिए. फिर कुच्छ देर ऐसी ही चलता गया. फिर अगली बारी चेतन की आई

ढूँढने के लिए. ललिता और चेतन जगह ढूँढने लगे छुप्ने के लिए. ललिता ने एक दम से कहा चल

दोनो अलमारी में छुप जाते है.. अब तक कोई भी नहीं छुपा है और शायद चेतन हम

दोनो को पहचानने में गड़बड़ कर्दे. अलमारी काफ़ी कपड़ो से भरी हुई थी मगर चंदर ने कहा कपड़े नहीं हटाएँगे क्यूंकी उसको शक़ हो जाएगा. तो दोनो किसी तरह अलमारी में घुसे और अपने आपको च्छुपाने

के लिए कपड़े रख दिए अपने उपर.

जैसी ही चेतन ने अंदर आने के लिए कहा वैसे ही ललिता जल्दी से हिली अलमारी के अंदर. चंदर ने हल्के से

कहा क्या कर रही हो दीदी." "अर्रे मेरी टाँग पे लग रही थी"ललिता ने हल्के से कहा. ललिता ने अपनी

टाँग अब चंदर की उल्टी जाँघ पर रख दी. ललिता का पैर चंदर के लंड को हल्के से च्छू रहा था.

चंदर अब ललिता की टाँग हटा भी नहीं सकता था क्यूंकी चेतन को पता चल जाता कि वो अंदर छुपे हुए है.

चंदर का लंड अब जागने लगा लगा. और हर 2 सेकेंड में हिलने लगा था. ललिता मन ही मन मुस्कुराने

लगी थी क्यूंकी उसको चंदर की परेशानी पता चल गयी थी. चंदर अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता था और

हिल गया ताकि ललिता अपने पैर हटा ले मगर अब ललिता का पैर पूरी तरह से चंदर के लंड पे था.

ललिता हल्के से हंस पड़ी और तभी चेतन ने अलमारी खोल ली. उसने दोनो को पकड़ लिया. चंदर जल्दी से टाय्लेट

चला गया पिशाब करने के लिए. ललिता ये देख और मुस्कुराने लगी.

काफ़ी रात हो गयी थी तीनो ने फिर खाना मँगवाया और उसके साथ एक डरावनि फिल्म की सीडी मँगवाई.

खाना खाने के बाद तीनो एक एक सोफे पे बैठ गये और टीवी पे डरावनी मूवी लगा दी. उसके उपर घर की

लाइट्स भी बंद करदी ताकि थोड़ा डर लगे. मगर फिल्म को देखते देखते तीनो की हवा निकल गयी.

तीनो काफ़ी डरे हुए थे. चेतन ने किसी तरह उठ कर घर की लाइट ऑन करदी. कुच्छ देर तक किसी तरह समय

निकलता रहा और चंदर बात करते करते सोफे पे ही सो गया. कुच्छ देर और गुज़रने के बाद

चेतन और ललिता को भी नींद आने लगी. चेतन ने चंदर को उठाने की कोशिश करी मगर वो उठा नहीं.

ललिता ने कहा कि इसको यहीं सोने दो अगर आँख खुलेगी तो कमरे में आजाएगा. चेतन को भी ठीक

लगा और दोनो अपने अपने कमरे में चले गये.काफ़ी देर सोने के बाद ललिता की आँख खुल गयी.

उसने घड़ी में देखा की 4 बज रहे थे. वो बिस्तर से उठी और टाय्लेट गयी. फिर वो कमरे के बाहर गयी देखने

कि चंदर अभी भी बाहर सो रहा है या अंदर कमरे में चला गया. उसने अपने कमरे की लाइट ऑन करी

और दरवाज़ा थोड़ा सा भेड़ दिया ताकि ड्रॉयिंग रूम रूम में थोड़ी सी रोशनी रहे. चंदर खराते लेकर बाहर

ही सो रहा था एक पतली सी चादर में. ललिता दबे पाओ उसके पास गयी उसका चेहरा देखने के लिए.

चंदर की चादर आधी नीचे फर्श पे गिरी हुई थी. ललिता ने सोचा कि चंदर को ढंग से ऊढा देती हूँ.

जब ललिता ने चादर उठाई तो वो चंदर के लाल कछे को देखते शर्मा गयी. ऐसे नहीं कि चंदर सिर्फ़ लाल

कछे में सो रहा था मगर उसका ट्राउज़र सोते समय थोड़ा नीचे हो गया था. ललिता ने चादर

उठाके साइड में रखी और फर्श पे बैठ गयी ताकि उसको ढंग से दिखे. ललिता को अब कोई होश

नहीं था और इसीलिए उसने अपना हाथ बढ़ाया और चंदर की शर्ट को थोड़ा सा उपर कर्दिआ. चंदर का पेट ऐसा

लग रहा था कि किसी लड़की का पेट हो. बिल्कुल गोरा और बिना किसी बाल के. ललिता ने अपना हाथ थोड़ा नीचे

किया और चंदर के ट्राउज़र के उपर रख दिया ताकि वो उसका लंड महसूस कर पाए. ललिता शरम के मारे मुस्कुरा

रही थी. उसे अपने पैंटी के नम होने का एहसास हो गया था. ललिता अब सीमा को पार करने वाली थी.

उसने अपना हाथ बढ़ाया चंदर के अंडरवेर की तरफ मगर चंदर ने कारबट लेली. ललिता ने अपना हाथ रोक लिया.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

उसे अंदाज़ा हो गया जो वो कर रही है वो ग़लत होगा. अपनी हवस को नज़र अंदाज़ करकर उसने

चंदर को चादर ऊढाई और वहाँ से चली गयी. भोपाल में शाम का समय था. डॉली ने स्कूल के डिन्नर के लिए कपड़े निकाले...

उसने सोचा कि पापा के स्कूल पहली बारी जवँगी तो थोड़े ढंग के कपड़े पेहेन्के

चली जाती हूँ. डॉली ने एक लाल सारी निकाली जिसपे काले रंग का काम हुआ था.

फिर उसने काले रंग का पेटिकट और काले रंग ब्लाउस निकाला.

डॉली ने ब्लाउस पेहेन्के देखा तो उसको वो 1 इंच बड़ा लगा...

डॉली के पास सिर्फ़ यही एक सारी थी और इसके अलावा कुच्छ पहेन ने के लिए

कुच्छ भी नहीं था,,, डॉली को लगा कि कोई दर्जी इस ब्लाउस को ठीक कर्देगा ताकि

इससे पहना जा सके... उस वक़्त डॉली ने सफेद डीप नेक सूट पहेन रखा था

और वो उसको ही पेहेन्के चली गयी. उसको पता था क़ी सड़क के किनारे एक दर्जी

बैठा रहता है पेड के नीचे तो वो उसके पास पहुच गयी.....

दर्जी 40-45 साल का लग रहा था और एक सफेद कुर्त पाजामे में बैठा हुआ था...

आँखो में बड़ा चश्मा और बड़ी सफेद रंग की दाढ़ी थी उसकी...

बड़ा अजीब सा दिख रहा था और अपने काम में ही लगा हुआ था. डॉली ने अपनी पतली

आवाज़ में बोला "भैया" इक़बाल दर्जी वाले ने नज़र उठाके देखा और

डॉली को देख कर ही वो हिल गया. इक़बाल ने कहा "जी बोलिए मेडम"

डॉली ने कहा "भैया ये मेरा ब्लाउस है इसकी 1 इंच कम करना है"

इक़बाल दर्जी वाले ने डॉली की उंगलिओ को छुते हुए ब्लाउस पकड़ा और चालाकी से बोला

"किस तरफ से दबाना है" डॉली ने कहा "दोनो तरफ से 1-1 इंच दबा दो".

इक़बाल का लंड जाग गया था डॉली की मीठी आवाज़ में ये सुनके.

"ठीक है काम हो जाएगा.... आप ये कल ले लेना आके" इक़बाल ने कह दिया. फिर पूरा दिन और रात ऐसी ही निकली.

ललिता ने चंदर से ढंग से बात भी नहीं की और पूरे समय अपने कमरे में ही रही. पूरी रात चंदर सो नहीं पाया. उसके दिल दिमाग़ पर बस ललिता ही छाई हुई थी.

अगले दिन भोपाल में डॉली ने एक टाइट काले रंग का टॉप पहना हुआ था और

नीचे काली जीन्स जोकि उसकी टाँगो से चिपकी हुई थी. डॉली जब इक़बाल दर्ज़ी

के पास पहुचि तो वो अभी भी काम में लगा हुआ था.

डॉली ने फिर से आवाज़ दी "भैया"... इक़बाल दर्ज़ी ने देखा और फिर से

डॉली को देख के हिल गया. डॉली ने कहा "भैया मेरे ब्लाउस का काम हो गया?"

इक़बाल दर्ज़ी वाले ने चालाकी से कहा "कौनसा ब्लाउस और क्या काम करवाना था ?"डॉली ने कहा "आररी काले रंग था एक इंच जिसका कम करना था"

इक़बाल ने ढूँढा ब्लाउस को और डॉली के उंगलिओ को छुते हुए ब्लाउस पकड़ा दिया

और कहा "एक बारी देख लेना कि काम ठीक से हो गया है कि नहीं"डॉली कहा

"ठीक है कितने रुपय हो गये"इक़बाल ने कहा 15 रुपय देदो. डॉली ने उसको 20

रुपय दिए और जब इक़बाल उसको 5 रुपय लौटने लगा तो उसने 5 का सिक्का जान

के नीचे मगर थोड़ा दूर गिरा दिया.

इक़बाल ने डॉली से माफी माँगी और जब डॉली मूडी सिक्का उठाने के लिए तो उसका

काला टॉप उपर हो गया और उसकी काली जीन्स नीचे हो गयी और इस चक्कर

में डॉली की सफेद पैंटी भी हल्की से दिखने लगी. 5 सेकेंड के डॉली के लिए

डॉली की टाइट गान्ड इक़बाल के सामने थी मानो उसको बुला रही हो कि आके अपना

लंड घुसाले. डॉली ने सिक्का उठाया और इक़बाल को धन्येवाद बोलके चली गयी.

डॉली शाम को तैयार होने लग गयी नाइट स्कूल के लिए. डॉली का

बहुत मन था अपनी नयी पुश अप ब्रा पहनने का मगर वो ये भी नहीं चाहती थी

कि उसके पापा के स्कूल वाले उनके बारे में कुछ उल्टा सीधा बोले...

फिर उसने सेमी ट्रास्पेरेंट वाली ब्रा निकाली और उसके साथ काले रंग की पैंटी भी.....

और फिर उसने अपनी लाल सारी निकाली और उसके काले रंग का ब्लाउस और पेटिकट. डॉली

अच्छे से अपना मेक अप करा और हाइ हील्स पहने..

आज वो पूरी बॉम्ब लग रही थी. उसको लग रहा था कि आज स्कूल में सब उसको ही देखते

रह जाएँगे.जब नारायण घर आया तो वो भी डॉली को देख कर दंग रह गया.

उसको नहीं पता कि उसकी बेटी इतनी जानलेवा लग सकती थी. उसने डॉली की काफ़ी तारीफ

करी और डॉली भी शरमाती रही. जब अब्दुल गाढ़ी लेके पहुचा नारायण और

डॉली को स्कूल ले जाने के लिए तो उसके भी होश उड़ गये डॉली को देखकर.

पूरे रास्ते उसके दिमाग़ में वो टाइट मम्मे और गान्ड जो कि काले रंग में

लिपटे हुए थे नज़र आ रहे थे. जब उसने दोनो को गाढ़ी से उतारा तो वो सीधा

स्कूल के टाय्लेट चला गया और 10 मिनट तक लंड को मसलता रहा मानो जैसे डॉली को ही चोद रहा हो.

उधर स्कूल के अंदर भी सारे डॉली की तारीफ कर रहे थे. आदमी हो यह औरत या

फिर उनके बच्चे सब डॉली की खूबसूरती की तारीफ कर रहे थे. डॉली को भी

पता चल रहा था कि कौन उसके खूबसूरती या कपड़ो और या फिर उसके जिस्म की तारीफ

कर रहा है. डॉली किसी से भी ज़्यादा घुली मिली नहीं और ज़्यादा समय अकेले ही रही.

गोपाल भी डॉली से ज़्यादा बात नही कर पाया क्यूंकी वो नही चाहता कि कोई कुच्छ ग़लत मतलब निकाले. डॉली जब खाना लेके एक कुर्सी पे बैठने लगी तो उसकी पैंटी घूम घूम

कर उसकी गान्ड में घुस गयी... उस वक़्त उसको काफ़ी बेचैनी होने लगी मगर फिर

वहाँ एक लड़का उसके पास गया और उसने साथ वाली कूसरी की तरफ इशारा करते हुए

पूचछा "क्या मैं इस कुर्सी पे बैठ सकता हूँ." डॉली ने हां कह दिया.

फिर उन दोनो ने बात करनी शुरू करी. बातों बातों में पता चला कि कोई

शांति वेर्मा है जो कि इस स्कूल में पढ़ाती है उनका बेटा है. उसका नाम राज

है और वो भी इसी स्कूल में 12 क्लास में पढ़ता है. डॉली और राज ने काफ़ी

बातें करी और इसी कारण डॉली की बोरियत भी ख़तम हो गयी. जब सब

वापस घर के लिए रवाना होने लगे तो राज ने डॉली से उसका नंबर माँगा

और डॉली ने खुशी खुशी उसको अपना नंबर दे दिया.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

उधर दूसरी ओर रात के 12 बज रहे थे पूरे घर में अंधेरा था बस एक टीवी की रोशनी

आ रही थी. चंदर और चेतन दोनो साथ में बैठके आहिस्ते करके ब्लू फिल्म देख

रहे थे. दोनो अलग अलग सोफा पे बैठे थे एक चद्दर के अंदर. दोनो ही धीरे

धीरे अपने लंड को मसल रहे थे ताकि एक दूसरे को पता ना चले मगर चंदर

अपना लंड ललिता को सोच सोच के मसल रहा था.

एक दम से दरवाज़ा खुला और शन्नो अपनी आँख मल्ति हुई कमरे के बाहर आई. जल्दी से

चंदर अपना हाथ चद्दर में से निकाला चॅनेल बदलने के लिए तब तक

शन्नो को एक झलक मिल गयी थी टीवी की. फिर भी उसने पूछा "क्या कर रहे हो इतनी रात

को तुम दोनो" चेतन ने घबराते हुए कहा "कुच्छ नहीं बस नींद नहीं आ

रही थी तो टीवी देख रहे थे." शन्नो मन ही मन मुस्कुरा रही थी दोनो को इतना

घबराया हुआ देखकर.

उनको थोड़ा और सताने के शन्नो ने पूछा "क्या देख रहे हो टीवी पर" चंदर बोला "कुच्छ नहीं आंटी बस ऐसी ही चॅनेल चेंज कर रहे है कि कहीं कुच्छ अच्छा आ जाए"

फिर शन्नो ने कहा "अच्छा ठीक है पर सो जाना थोड़ी देर में क्यूंकी काफ़ी रात

हो गयी है" शन्नो ने किचन से पानी लिया और वापस अपने कमरे में चली गयी.

दोनो ने एक दूसरे को देखा और बोला बच गये यार आज. चेतन ने कहा

"मैं तो जा रहा हूँ हूँ सोने.. तू भी आजा कहीं मम्मी फिर से ना आजाए".

चंदर ने कहा "अबे अब नहीं आएँगी. आजा ना बैठ ना मेरे साथ".

चेतन ने चंदर को मना कर दिया और कमरे में चला गया. उस ब्लू फिल्म को

देख कर चेतन को डॉली के साथ बिताई वो दो रात याद आगयि थी... उसको अब इन

फ़िल्मो में इतना मज़ा नहीं आता था क्यूंकी वो असली में चोद चुका था अपनी बहन को....

अब उसको इंतजार था कि कब उनके एग्ज़ॅम्स होंगे और कब वो डॉली से मिलेगा...

फिलहाल चंदर को भी डर था कि कहीं चेतन की मम्मी वापस ना आजाए और इसलिए

वो बड़ा सावधान हो रखा था. कुच्छ देर बाद उसने घड़ी में समय देखा

तो रात 3 बज गये थे. समय देखकर ही उसको भी अब नींद आने लगी तो उसने टीवी

बंद कर दिया और सोफे से उठकर ज़ोर से अंगड़ाई लेने लगा... चेतन के कमरे की ओर

कदम बढ़ाते हुए ही उसको लगा कि एक बारी टाय्लेट होके आजाता हूँ. चंदर ललिता के

कमरे के तरफ बढ़ा जिसमे अंधेरे के अलावा कुच्छ और दिखाई नहीं दे रहा था...

किसी तरह से उसने टाय्लेट की लाइट ऑन करी और अंदर गया. किसिके कमरे में आने की

वजह से ललिता की भी नींद टूट गयी थी और टाय्लेट की हल्की रोशनी से उसको पता चल

गया था कि चंदर टाय्लेट गया है.... सानिया ने झट से अपने उपर से चद्दर हटाई और

बिल्कुल सीधी पीठ के बल सोने का नाटाक़ करने लगी. टाय्लेट के अंदर से फ्लश की

आवाज़ आई और 10 सेकेंड में टाय्लेट का दरवाज़ा खुला... जब चंदर बाहर निकला तो

टाय्लेट की वजह से कमरे में थोड़ी रोशनी थी और उसने ललिता को सोते हुए देखा.

उसने जो टॉप पेहेन रखा था वो काफ़ी टाइट लग रहा था जिस वजह से उसके मम्मे

और भी बड़े लग रहे थे. चंदर के दिमाग़ में अभी ब्लू फिल्म ही चल रही थी और

एक झटके में उसका लंड फिर से जागने लगा.... उसको याद आया कि जिसने भी इस दुनिया

में रिस्क लिया है वोई अभी मज़िल झू पाया है और इसी सोच ने उसको रिस्क लेने

पर मजबूर कर दिया. उसने टाय्लेट का दरवाज़ा हल्का सा भेड़ दिया और दबे पाओ ललिता

के बिस्तर की तरफ गया. उसकी नज़रो के सामने ललिता के मम्मे उपर नीचे हो रहे थे.... उसने अपना हाथ ललिता के चेहरे के उपर हिलाया ताकि उसे पता चल सके कि

ललिता नींद में है भी के नहीं. जब उसको थोड़ा विश्वास आया तो उसने

अपने काप्ते हुए हाथ को बढ़ाया और उसके कंधे को हल्के से छुआ.

ललिता भी पूरी कोशिश कर रही थी कि चंदर को ज़रा सा भी शक़ ना हो पाए.

जब वो लंबी लंबी सासें ले रही तो उसके बड़े मम्मे और भी बड़े लगने लगे.

चंदर ने अपनी ठंढी उंगलिओ से ललिता के माथे और फिर गाल को छुआ

और फिर उसके होंठो को महसूस किया. चंदर अपने बढ़ते हुए लंड को अपने पाजामे

में ठीक करता हुआ सोचने लगा कीदरवाज़ा बंद कर देता ताकि शन्नो आंटी

कमरे में ना आ पाए. उस समय उसको यही ठीक लगा तो उसने आहिस्ते से कुण्डी लगा दी. चंदर अब बिस्तर के दूसरी ओर गया और उसने ललिता के गोरे पैरो को छुआ.

उसने अपना सिर नीचे करा और बिकुल आहिस्ते से उनको चूमा. अब उसके दिमाग़ में सिर्फ़

हवस भरी हुई थी क्यूंकी वो कुच्छ ज़्यादा ही गरम हो चुका था. चंदर ने

अपने दोनो हाथ बढ़ाए और ललिता का टॉप उपर करने की कोशिश की.

दिक्कत ये थी कि ललिता ने टॉप अपने ट्राउज़र के अंदर घुसा रखा था.

चंदर ने एक बारी भी ना सोचा और टॉप को किसी तरह बाहर निकालने की कोशिश करी.

काफ़ी मेहनत के बाद आगे से टॉप बाहर आ गया मगर पीठ की तरफ से अभी

भी अंदर ही घुसा हुआ था. चंदर ने अपना ध्यान टॉप से हटाया और ललिता के स्तनो

को (जोकि अभी टॉप के अंदर थे) महसूस किया. जैसी ही उसने स्तनो को छुआ उसका

लंड पूरी तरह खड़ा हो गया. अब वो हल्के हल्के से उन्हे दबाने लगा.

उसको लग रहा था कि ललिता ने ब्रा पहेन रखी इसीलिए वो उसकी चूची को महसूस

नही कर पाया. ललिता भी अब काफ़ी गरम हो गई थी और इसलिए वो एक दम से बिस्तर पे पलटी. चंदर थोड़ी देर के लिए घबरा गया. चंदर मन ही मन मुस्कुराने लगा

क्यूंकी अब ललिता पेट के बल लेती हुई थी. ललिता को भी पता था ये करने से चंदर को टॉप निकालने में आसानी होगी. चंदर ने हाथ बढ़ाया और टॉप को बाहर निकाला.

दोनो के मुँह में पानी आ गया था. आहिस्ते से चंदर ने टॉप उपर करा और फिर

उसे सफेद ब्रा दिखी. अब चंदर और उसकी जिस्म की प्यास के बीच में सिर्फ़ दो हुक का

फासला था. चंदर ने कोशिश करी उसको खोलने क़ी मगर उससे नहीं खुला और

उसने उसको तोड़ने की कोशिश भी करी मगर उसे वो भी नही हो पाया.

गुस्सा, बैचैनि, हार और मायूसी ऐसी कयि चीज़े उसके चेहरे पे झलक रही थी.

मगर फिर उसने ललिता की गान्ड को देखा जोकि उसकी उंगलिओ को पुकार रही थी.

उसने थोड़ी देर तक ललिता की बड़ी गान्ड पे हाथ फेरा और एक दम से ललिता के ट्राउज़र को नीचे कर दिया. ललिता एक दम से डर गयी. सब कुच्छ इतनी जल्दी हो रहा था और

अब उसको गीलापन भी महसूस हो रहा था. चंदर ने अपने ट्राउज़र और कच्छे

को नीचे किया और अपने साडे 6 इंच का लंड बाहर निकाला जोकि खंबे की तरह

सख़्त और उचा था. फिर उसने लंड ललिता के हाथ पे रख दिया और ललिता की उंगलिओ से

अपने लंड को दबाया. घबराहट के साथ ललिता को बड़े मज़े भी आने लगे थे.

इतना बड़ा लंड उसके कमरे मे उसके हाथ में है और वो भी उसके भाई के दोस्त का

ये सोचके वो काफ़ी नशे में थी. चंदर ने सोचा कि अब देर नही करनी चाहिए और

अब उसने ललिता की पैंटी पे अपनी नज़र डाली. कुच्छ ही पल में उसने हिम्मत

दिखाते हुए ललिता की पैंटी को थोड़ा नीचे कर दिया. ललिता की गोरी गान्ड अब

उसके सामने थी और जैसे ही उसने गान्ड को महसूस किया उसके लंड से हल्का

सा पानी आ गया. इसकी वजह अब ललिता और घबरा गयी. चंदर ने कुच्छ सेकेंड

तक अपना हाथ ललिता की कोमल गान्ड पे फेरा. पर अचानक से कमरे के

बाहर से कुच्छ आवाज़ आई और फिर बाहर की लाइट ऑन हो गयी. चंदर हद से ज़्यादा

घबरा गया और ललिता की जान ही चली गयी. चंदर ने ललिता के कपड़े ठीक किए और

अपने लंड को ट्राउज़र के अंदर डाला. उसने दरवाज़े की कुण्डी हल्के से खोली और

आस पास देखा और उसे कोई नही दिखा. वो जल्दी से कमरे से निकला और जाके चेतन

के बिस्तर पर लेट गया. कुच्छ सेकेंड बाद उसकी जान में जान आई. उसका पूरा

माथा पसीने से लत्पत था. कब उसकी आँख लग गयी उसको पता नही चला.

ललिता अपने बिस्तर से उठी और सीधा टाय्लेट गयी. उसने अपने हाथ को सुँगा और

अजीब सी बदबू आ रही थी. कुच्छ सेकेंड बाद बदबू खुश्बू में महसूस होने लगी.

फिर उसने अपने हाथ को चाटना चाहा मगर आधी दूरी पे वो रुक गयी.

उसने अपने हाथ धोए और वापस सोने चली गयी. थोड़ी देर बाद शन्नो ललिता

के कमरे में आई और उसके नींद से जगाया. ललिता ने हल्की से अपनी आँख खोली.

शन्नो ने कहा "बेटा बुआ की तबीयत फिर से खराब हो गयी है और ऑपरेशन करना पड़ेगा. मैं हॉस्पिटल जा रही हूँ. तुम लोग अपना ख़याल रखना और खाने का देख लेना.. मैं कॉल करूँगी बादमें" ये बोलके शन्नो हॉस्पिटल जाने के लिए निकल गयी.

शन्नो हॉस्पिटल जाने के लिए तेज़ तेज़ चलके बस स्टॅंड जा रही थी... उसने आज पीले और

नीले रंग का सलवार कुर्ता पहेन रखा था क्यूंकी बस में सारी पेहेन्के जाना

काफ़ी मुश्किल हो जाता था. शन्नो हमेशा बस में ही जाना पसंद करती थी और

इसका सबसे बड़ा फ़ायदा था पैसा. जैसे कि मैने पहले आपको बताया था कि शन्नो पैसो

के मामले में बहुत सावधानी रखती थी और वो शायद इसलिए था क्यूकी

उसके पास उतना नहीं था.... जहाँ वो ऑटो में 100 रुपय खर्च करती वहीं

वो 20 रुपय में बस से चली जाती....

क्रमशः……………………….


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

जिस्म की प्यास--10

गतान्क से आगे……………………………………

खैर जब वो बस स्टॉप पर पहुचि तो वहाँ बहुत ही ज़्यादा भीड़ थी. कुच्छ ऑफीस जाने

के लिए खड़े थे और काफ़ी कॉलेज के लड़के लड़की खड़े थे. इनको देख कर शन्नो

को अपनी प्यारी बेटी डॉली की याद आगयि. उसमें से एक लड़की थी जो काफ़ी हद तक

उसे डॉली की याद दिला रही थी ख़ासतौर से उस लड़की की मुस्कान....

फिर थोड़ी देर में बस आई और सब एक दूसरे को धक्का देके बस में चढ़ गये.

गर्मी वैसे ही दिल्ली में छाई हुई थी और बस में इतनी भीड़ होने के कारण और

पसीने आ रहे थे मगर सबसे बड़ी दिक्कत थी कि शन्नो को 1 घंटे तक इस बस में रहना था.

शन्नो जैसे तैसे करके बस की भीड़ के बीच में आगयि. उसने देखा कि उसके

सामने वोई लड़की खड़ी थी जो उसे डॉली की याद दिला रही थी.... कुच्छ देर के लिए

वो बड़ी मुश्किलो से खड़ी रही. कभी बस के झटके लगते तो वो उल्टी दिशा में

गिरती तो कभी सीधी और कभी कबार तेज़ ब्रेक लगने पर पूरी भीड़ एक

के उपर एक लड़ जाती.... शन्नो की परेशानी को देखकर एक 22-23 साल का लड़का उठा

और उसने शन्नो को सीट देदि. वो लड़का शन्नो के साइड में ही खड़ा हो गया.

शन्नो ने उसे दिल से शुक्रिया कहा और आराम से जाके बैठ गयी. 15 मिनट बीत

गये थे और अभी भी बस पूरी तरह भरी थी. पसीने की बदबू पूरी बस

में फैल गयी थी. अचानक से शन्नो की नज़र उसी लड़के पे पड़ी जोकि

तिर्छि नज़रो से उसके बदन को निहार रहा था. शन्नो को गुस्सा आया मगर उसने

कुच्छ कहा नहीं. शन्नो को ध्यान आया कि उसका दुपट्टा कुच्छ ज़्यादा ही उपर की तरफ

हुआ पड़ा है जिस वजह से शायद वो लड़का उसके कुर्ते के अंदर झाक रहा होगा...

उसने जल्दी से अपने दुपट्टे को ठीक करा.

कुच्छ देर बाद शन्नो ने देखा कि अब उसी लड़के की नज़रे उसके आगे

खड़ी लड़की पे थी... उस लड़की ने नीले सलवार और शॉर्ट कुर्ता पहेन रखा था.

वो लड़की वोई थी जो शन्नो को डॉली की याद दिला रही थी... ये बदमाश लड़का

उस लड़की के बदन को ताकने लगा. जब भी कुच्छ झटका आता तो वह अपना

बदन उस लड़की से चिपका देता और लड़की बेचारी को भीड़ के मारे सब सहना पड़ता.... शन्नो को पता चल गया था कि ये लड़का कितना बड़ा थर्कि है. उस प्यारी लड़की

के ना मना करने पर अब उस लड़के के सिर दिमाग़ में कुच्छ ज़्यादा ही जोश छा गया था....

उसने उंगलिओ से उस लड़की के नीले कुर्ते को कोने से हल्के से पकड़ा. कुच्छ देर

उससे खेलते हुए वो उसको धीरे धीरे उपर उठाने की कोशिश करने लगा.

वो कुरती इतनी उपर हो गयी थी कि अब उस लड़की की सलवार से धकि हुई गान्ड नज़र आ रही थी... उस लड़की की सलवार भी पसीने के कारण उसकी गान्ड से चिपकी हुई थी.

उसके नितंब की पूरी गोलाई नज़र आ रही थी. वो लड़का दूसरे हाथ से अपने लंड

(जो कि जीन्स के अंदर था)को सहलाने लगा. फिर उस लड़के ने अपना हाथ

बढ़ाया और अपनी उंगलिओ से उस लड़की की गान्ड को छुने लगा और मौका देखकर

ही अपना पूरा हाथ गान्ड पे रख दिया. शन्नो उस लड़के की दबन्ग्पने को

देख कर दंग रह गयी. उसको लगा कि शायद लड़की को पता ना चला हो क्यूंकी वो लड़का

अपना हाथ नहीं हिला रहा था. मगर वो और भी दंग रह गयी जब उस लड़के ने

उस लड़की की गान्ड पे हाथ हिलाना शुरू किया. उस लड़के के चेहरे पर गंदी सी मुस्कुराहट छा गयी थी.... .

शन्नो का दिमाग़ सोच में पद गया था कि अब इस लड़के के गंदे दिमाग़

में क्या चल रहा होगा... बड़ी गौर से वो लड़के की हर हरकत पे नज़र रखने लगी....

फिर उस लड़के ने अपना हाथ उस लड़की के कमर की तरफ बढ़ाया और उसको रैंग्ता हुआ आगे लेगया पेट की तरफ. पूरे समय लड़की सीधी खड़ी रही जैसे कि उसको साप सूंग

गया हो. शन्नो आगे की तरफ झुक के बैठ गयी ताकि वो सब कुच्छ देख सके.

उस लड़के का हाथ अभी भी पेट पे ही था शायद नाभि की तरफ...

उस लड़के ने उस लड़की को ज़ोर से अपनी तरफ धकेला और दोनो का बदन चुंबक

की तरह चिपक गया... वो लड़का अब जोश में आ गया था और अब वो उसके स्तनो

की तरफ बढ़ गया. उस लड़की ने दुपट्टा ओढ़ रखा था और उस लड़के का हाथ

उसे छुपा हुआ था. लड़की के मम्मे डॉली के जैसे छोटे थे और उसने

ब्रा भी पहनी हुई थी तो इसलिए वो लड़का वापस अपना हाथ गान्ड की तरफ ले आ आया.

और फिर उसने हाथ बाहर निकाल लिया और कुच्छ समय के लिया सीधा खड़ा रहा.

एक अजीब सी ख़ालीपन था सा शन्नो का अंदर. वो कुच्छ ज़्यादा ही घुस गयी

थी इन बातो में और देखना चाहती थी कि ये कितनी हद्द तक जाते है. कुच्छ मिनट बाद

वो लड़का उस लड़की से चुपक के खड़ा हो गया. दोनो के बीच से शायद ही

हवा जा सकती हो. उसने उस लड़की का हाथ बढ़ाया और अपने लंड की तरफ ले गया.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

लड़की एक दम से उस लड़के के लंड को सहलाने लग गयी. शन्नो ये देख कर सोच में

पड़ गयी कि ये आजकल के बच्चो को क्या हो गया है. वो लड़की पूरे होश

में उसका लंड सहला रही थी जो कि अभी भी जीन्स में ही था. वो लड़का अब अपनी

सीधे हाथ की उंगली उसी लड़की की गान्ड की दरार पर चला रहा था और चलते चलते

उस लड़की की गान्ड के अंदर डालने लगा... जब भी वो लड़का ज़ोर लगाता उस शन्नो

को ऐसा लगता कि उस लड़की की मन ही मन में चीख निकल जाती.... "क्या कोई और भी

ये देख पा रहा है?" ये सवाल शन्नो के दिमाग़ में था....

शन्नो इतने गौर से देखने लगी उन दोनो की हर्कतो को कि उसको ये भी नहीं पता

चला कि उस लड़के की तिर्छि निगाहें शन्नो को घूर थी.... और फिर अचानक

से एक बिजली के करेंट की तरह शन्नो को उस लड़के का कलाई अपने सीधे स्तन के पिच्छले

हिस्से पर महसूस हुई....शन्नो का बदन उस चुअन से काप गया...

फिर कंडक्टर ने ज़ोर से आवाज़ लगाई "अपोलो हॉस्पिटल" "अपोलो हॉस्पिटल"..

ये सुनके शन्नो होश में आई और हैरान परेशान होके उस बस में से

भागते हुए उतर गयी. उसने अपने माथे का पसीना पौछा और हॉस्पिटल में

सीधे जाके टाय्लेट में घुस गयी.

उस लड़के ने शन्नो के अंदर की हवस को फिर से जगा दिया था... शन्नो का हद्द से

ज़्यादा मन कर रहा था कि कोई जिस्म की प्यास भुजा दे मगर उसके मन की आवाज़ कोई

नही सुन पा रहा था... उसकी आत्मा बेशक मना कर रही थी मगर अपने

दिमाग़ को वो रोक नहीं पा रही थी... अपने दोनो हाथो से उसने अपनी सलवार का

नाडा खोला और उसको नीचे सरका दिया... अपनी सीधे हाथ की उंगलिओ से उसने

मेशसूस किया कि उसकी पैंटी कितनी हद तक गीली हो चुकी थी...

अपनी पैंटी को उतारकर उसने अपनी चूत को देखा जिसपे गीलनापान सॉफ नज़र आ रहा था.... अपनी बड़ी आँखें बंद करके अपनी गीली चूत को अपनी उंगली से छूते ही वो

हवस में डूब गयी.... जैसी ही वो आगे बढ़ने लगी उसके पर्स में से मोबाइल की घंटी बजने लगी...

सुबह के 9 बजे थे और पूरे घर में शांति. ललिता की आँख खुली और वो अपनी

आँख मलते हुए कमरे के बाहर गयी. उसको याद आया कि आज तो मम्मी घर

पे नहीं है. फिर वो कल की हसीन रात के बारे में सोचने लगी.

एक एक पल को ध्यान से याद करने लगी. अगर मम्मी नहीं उठाती तो शायद चंदर

कभी भी नहीं रुकता और शायद वो पहली बारी एक मर्द की ताक़त को महसूस करती.

ललिता के दिमाग़ में आया कि अगर आज मम्मी नहीं है तो आज का दिन काफ़ी अच्च्छा

बीत सकता है. वो फिर अपने कमरे में गयी और दरवाज़ा बंद कर दिया.

उसने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और जाके शवर के नीचे खड़ी हो गयी...

नहाने के वक़्त उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थी ताकि वो चंदर के हाथो को

अपने जिस्म पे महसूस कर पाए. नहाने के बाद उसने अपने बदन के गीलेपन

को सुखाया और नंगी अपने रूम में आ गयी. कुच्छ अपने आपको शीशे में

निहारने के बाद उसने अलमारी में से कपड़े निकाले पहेन्ने के लिए.

सबे पहले उसने सफेद पैंटी और ब्रा पहनी. पैंटी थोड़ी छोटी थी इससलिए पूरी गान्ड

धक नहीं पा रही थी. फिर उसने एक गुलाबी और सफेद रंग की स्कर्ट(फ्रोक) पहनी

जो कि उसके घुटने के उपर तक ही थी और आख़िर में उसने एक टाइट गुलाबी रंग का टॉप

पहेन लिया जोकि उसके स्तन की गोलाई सॉफ दिखा रहा था. उस टॉप की और ख़ासियत भी थी

कि वो डीप कट था और ज़्यादा झुकने से काफ़ी क्लीवेज दिख जाता था. अब उसको सिर्फ़ चंदर

के आने का इंतजार था...

आच्छे से तैयार होने के बाद वो अपने कमरे में इंतजार करती रही... काफ़ी देर तक इंतजार करने के बाद

भी उसे किसी की आवाज़ तक भी नहीं आई... परेशान होकर वो अपने कमरे के बहार निकली और अपने भाई के कमरे

के की ओर बढ़ी..... उसने धीरे से दरवाज़ा खोला पर वहाँ उसे कोई दिखाई नहीं दिया.

वो जल्दी से गयी और अपने भाई को कॉल करा और उसने बताया कि वो और चंदर दोस्तो से मिलने गये है और

घंटे में घर आजाएँगे. उसे अपनी बेवकूफी पे बहुत गुसा आया... उसे पता नही था कि अब अगले एक घंटे तक

वो कैसे गुज़ारा करेगी....अकेले बोर होने के बाद वो फिरसे अपने भाई के कमरे में गयी...

वहाँ उसने काले रंग का एर बॅग देखा जोकि चंदर का था.. नज़ाने उसको क्या सूझा वो उसके पास जाके उसको

खोलने लगी.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

काफ़ी कपड़ो को हटाकर उसको नीचे की तरफ बनियान मिली और उनके अंदर लिपटे हुए अंडरवेर दिखे....

जो अंडरवेर थे वो अलग अलग डिज़ाइन के थे जिनको उसने बॅग में से बाहर निकाल दिया... हर एक को उठाकर वो

सोचने लगी कि इनमें चंदर कैसे दिखेगा. ललिता को मस्ती सूझी और उसने अपनी फ्रोक को उतारा और

फिर अपनी पैंटी को. उसने चंदर का एक हरे रंग का कच्छा उठाया और उसको पहेनलिया. कच्छे को पेहेनने

के बाद वो अपने आपको शीशे में देखने लग गयी. ललिता को काफ़ी ताजुब हुआ क्यूंकी वो अंडरवेर काफ़ी हद तक

उसके फिट आ रहा था. वो मुड़कर अपने नितंबो को देखने लगी.... एक शरारती मुस्कान च्छा गयी उसके चेहरे पर जब उसने एक हल्का सा छेद देखा चंदर के अंडरवेर में जिसमें से उसकी गोरी चमड़ी नज़र आ रही थी.....

उत्साहित होकर वो वापस बॅग की तरफ बड़ी और सारी चीज़ीं निकालने लगी और निकालते निकालते उसको एक काला

स्ट्रॅप सा नाराज़ आया एक पेपर के अंदर लिपटा हुआ और जब उसने वो पेपर निकाला तो उसमें उसकी काले रंग की

पैंटी और ब्रा लिपटे हुए दिखाई दिए. ये देख कर वो हँसने लगी. चंदर में ये सब करने की हिम्मत भी होगी ऐसा नहीं

सोचा था उसने. उस काली पैंटी को उसने सूंग के देखा तो उसकी नाक में वीर्य की सुगंध च्छा गयी...

नज़ाने कितनी बार चंदर ने उसको इस्तेमाल करा होगा मूठ मारने के लिए इसका को अंदाज़ा भी नहीं लगा सकती थी ललिता औरशायद चंदर को भी याद ना होगा..

फिर एक दम से घर की घंटी बजी और ललिता जल्दी से सारा समान बॅग में डालने लगी. उसने पूरी कोशिश करी कि

सारा समान वो ढंग से रख पायें मगर इस वजह से घंटियाँ और तेज़ बजने लगी. उसने जब बॅग बंद करके अंदर

रख दिया तो उसको ध्यान में आया कि अभी भी उसने चंदर का ही कच्छा पहेन रखा है. अब ललिता के पास समय नहीं था वापस बॅग खोलने का उसने जल्दी से अपनी फ्रोक (स्कर्ट) पहेनली और दरवाज़ा खोलने के लिए दौड़ी.

जब उसने दरवाज़ा खोला तो वहाँ दो लड़के खड़े हुए थे कंधे पे बॅग टाँगें हुए. ललिता ने उनसे पूछा "क्या काम है" उनमें से एक ने बोला "चेतन है क्या".

ललिता बोली "वो नहीं है तुम दोनो कौन?" फिर दूसरे लड़के ने ललिता को पूरी उपर से नीचे घूरते हुए बोला

"हम उसके दोस्त है उसने मिलने के लिए बुलाया था." ललिता ने उनको रुकने के लिए कहा और चेतन को कॉल करा.

"सुन दो लड़के आए है तुझसे मिलने के लिए" ललिता ने चेतन को बोला. चेतन ने कहा "अर्रे यार सुनो वो मेरे दोस्त होंगे

अल्ताफ़ और मयंक... प्लीज़ यार आप उन दोनो घर पे बिठा लो हम बस यहाँ से निकल ही रहें है".

"ठीक है पर जल्दी आना" ललिता ने थोड़ा गुस्से में बोला.

ललिता ने दरवाज़ा खोला और दोनो को अंदर बुलाया. दोनो जाके सोफे पे बैठ गये. ललिता ने दोनो को पानी दिया और

बोला की चेतन को आने में थोडा समय लग जाएगा जब तक टीवी देखलो.

फिर उनमें से एक ने पूछा "आप चेतन की बहन है" ललिता ने कहा "हां मेरा नाम ललिता है और तुम दोनो का"

दोनो ने अपना अपना नाम बता दिया. अल्ताफ़ दिखने में ठीक ही था और नज़ाने काफ़ी घबराया हुआ था.

उसके माथे का पसीना कोई भी देख सकता था. मगर जो मयंक था काला/अजीब सा दिख रहा था और बड़े मज़े

से टीवी देख रहा था. ललिता ने दोनो को अपने हाल पे छोड़ दिया और अपने कमरे का दरवाज़ा भेड़ के बैठ गयी.

कुच्छ देर बाद मयंक को सूसू आने लगी और सोचने लगा कि वो खुद टाय्लेट ढूँढे या चेतन की बहन से पूच्छे.

उसे अब और इंतजार नही हो रहा था और वो सीधा चेतन के कमरे मे चला गया टाय्लेट की तलाश में.

वो पहले भी यहाँ आया हुआ था तो उसको टाय्लेट ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं होनी थी....

जैसी ही वो टाय्लेट की तरफ बढ़ा तो उसकी नजरे कमरे के फर्श पे पड़ी तो उसकी आँखें बड़ी हो गयी.

उसने अपने हाथो से ललिता की सफेद रंग की पैंटी उठाई और दीवार से चुपक के खड़ा हो गया ताकि कोई उसे

देख ना सके... और जब उसने उस पैंटी को सुँगा तो उसका दिल मचल गया. ललिता की खुश्बू उस पैंटी में से सॉफ

आ रही थी... उसने जल्दी से वो पैंटी अपनी जेब में डाली और जानके ललिता जिस कमरे में बैठी उधर चला गया.


RE: Incest Porn Kahani जिस्म की प्यास - sexstories - 07-19-2018

हल्के सा दरवाज़ा जब उसने खोला तो बिस्तर पे बैठी ललिता अख़बार पढ़ रही थी... ललिता के चेहरे अख़बार था तो

उसको मयंक दिखाई नही दिया मगर मयंक उसके सामने खड़ा ललिता की गोरी टाँगो को देखने लगा....

अब लंड को ठीक करते हुए उसने दरवाज़े पे नॉक करा. फिर उसने पूछा "टाय्लेट कहाँ है"

ललिता ने उसको टाय्लेट की दरवाज़े की तरफ इशारा करा. मयंक जल्दी से उसमें जाके घुस गया और मूतने लगा.

उसने अपनी जेंब से ललिता की पैंटी निकाली और उसको सूँगने लगा. जो सपने में भी दिखना नामुमकिन था वो हक़ीकत

में हो गया था. मयंक सोचने लगा अगर ये चड्डी ललिता ने अभी उतारी होगी तो अभी अपनी फ्रोक के अंदर क्या पहना होगा.

क्या वो अपनी चूत को हवा दे रही होगी नंगी बैठी हुई...

उसी दौरान ललिता को याद आया कि उसने अभी भी मयंक का अंडरवेर पहेन रखा है और उसे बड़ी दिक्कत

यह थी कि उसकी पैंटी उसके छोटे भाई के कमरे के फर्श पे पड़ी थी. वो जल्दी से गयी अपने भाई के कमरे में भागी....

उसने हर जगह देखा मगर जब उसको अपनी पैंटी नहीं मिली तो वो घबरा गयी. वो सोचने लग गयी कि उसने पैंटी

को शायद उठा लिया हो या फिर कहीं और उतारी हो. फिर उसको लगा कि अगर इन दोनो में से किसी ने उठा ली हो तो परेशानी

बढ़ जाएगी. फिर ललिता ने समय लगाके देखा और उसको लगा कि अब उसका भाई और चंदर आने ही वाले होंगे तो वो जल्दी से चंदर का अंडरवेर वापस रख दे. मगर उसके लिए उसे फिर से अपने कमरे जाना पड़ेगा क्यूंकी अगर वो यहीं पर ही कच्छा उतार देती है तो उसको बाहर सिर्फ़ फ्रोक में जाना होगा जोकि ख़तरनाक हो सकता है. वो चुप चाप अपने

भाई के कमरे से निकली. दोनो लड़के अभी भी टीवी देख रहे थे और जब ललिता अपने कमरे में जाने लगी तब बेल बज गयी. पहली बारी ललिता को अपनी किस्मत पे रोना आ रहा था. वो दरवाज़ा के तरफ बढ़ी और ना चाहते हुए उसको खोला खोला. चंदर और चेतन बाहर ही खड़े हुए थे.. ललिता ने झूठी मुस्कुराहट से दरवाज़ा खोला और और वो दोनो अपने दोनो दोस्तो से मिले. परेशान ललिता भी अपने कमरे में चली गयी. कुच्छ देर अकेले बैठकर उसने भरोसा जाताया कि वो अपने उपर कोई दिक्कत नहीं आने देगी और वैसे भी ये बच्चे उसका क्या बिगाड़ लेंगे... वो चाहे तो सबको अपनी उंगलिओ पे नचा सकती है. फिर वो बाहर गयी खाना खाने के लिए और वापिस आगयि अपने कमरे में.

काफ़ी देर बाद चेतन आया कमरे में और उसने पूछा "यार ऐसे कैसे बैठे हुए हो कमरे में अकेले. चलो

बाहर आ जाओ ना." ललिता ने कहा कि वो बादमें आएगी. फिर चेतन ने कहा "अच्छा सुनो दीदी..

एक बात बतानी थी आपको.. ऐसा है कि मम्मी का कॉल आया था जब मैं घर पे नहीं था और उन्होने कहा था कि वो

आज घर नहीं आएँगी. और फिर मेरा और चंदर का प्लान बन गया अल्ताफ़ और मयंक के साथ की आज हम चार साथ में रहेंगे क्यूंकी चंदर भी कल घर चला जाएगा. आपको कोई परेशानी तो नहीं है ना इससे. ये जानके नज़ाने क्यूँ ललिता को ज़रा सा भी गुस्सा नही आया और उसने चेतन को कुच्छ नहीं बोला.

ये आखरी रात होगी चंदर के साथ उसकी... शायद इसके बाद वो चंदर से कभी ना मिले तो इसलिए आज कुच्छ तो

करना पड़ेगा.. ऐसा ख़याल ललिता के दिमाग़ चल रहा था. कुच्छ देर बाद जब हल्का अंधेरा छाने लगा तब

वो बिस्तर से उठी और टाय्लेट में जाके उसने चंदर के अंडरवेर उतार के एक काली पैंटी पैंटी पहेनली

और वो अंडरवेर संभाल के अलमारी में रख दिया. फिर वो अपने कमरे के बाहर आई. सब ट्राउज़र आंड टी-शर्ट

में बैठे हुए टीवी देख रहे थे. चंदर ने ललिता को देखा और दोनो हल्का सा मुस्कुराए. ललिता ने एक कुर्सी ली और

दोनो सोफे के बीच में बैठ गयी. चंदर पिच्छली रात के बारे में सोच रहा था जब उसने पहली बारी किसी

लड़की के कपड़े उतारे थे. आज की रात वो पिच्छली रात से हसीन बनाने की उसने ठान रखी थी. मगर उसको अभी भी

ये नहीं पता था कि कल जो भी हुआ वो सिर्फ़ ललिता की रज़ामंदी से हुआ था. अगर वो चाहती तो चंदर उसको छु भी नही पाता....कुच्छ देर बाद ललिता ने कहा "तुम लोग बोर नहीं हो गये टीवी देख देख कर.. कुच्छ तो आता नहीं है टीवी पर." चंदर ने भी हामी भरी.

चेतन और मयंक ने बोला तो फिर और क्या करें? चंदर ने कहा चलो फिरसे अंधेरा कमरा खेलोगे..

अब तो लोग भी ज़्यादा है मज़े आएँगे. सब इस बात से खुश हो गये और खेलने की तैयारी होने लगी. मयंक ने बोला

"मगर एक रूम में छुप्ने में कोई मज़े नही आएगा.. ऐसा करतें पूरे घर का रखते है..कम से कम

ढूँढने वाले को दिक्कत तो होगी. इस बात को भी सबने माना और फिर खेल शुरू हुआ.

सबसे पहले बारी पकड़ने की ललिता की आई और उसको काफ़ी समय लग गया पकड़ने में. ललिता चाहती थी कि चेतन की

बारी आए ढूँढने की मगर हर बारी वोआखिर में पकड़ा जा रहा था. लेकिन फिर उसकी फरियाद पूरी हो गई

और चेतन जिसकी वजह से ललिता/चंदर काफ़ी खुश थे.... जिस कमरे में चंदर छुप्ने गया उसी कमरे में जानके

ललिता भी चली गयी.... ललिता को पता था कि चंदर पर्दे के पीछे छुपा हुआ है और वो भी अंजान बनके पर्दे

के पीछे छुप गयी. पूरे कमरे में सिर्फ़ वो दो थे और अंधेरा छाया हुआ था. चंदर को लग रहा था कि उसकी

किस्मत ही बड़ी निराली है.... दोनो जानते थे कि चेतन को सबको पकड़ने में काफ़ी समय लगेगा और इसी का

फ़ायदा उठाना चाहते थे. चंदर को मगर घबराहट इस बात की थी कि ललिता को पिच्छली रात के बारें में कुच्छ नहीं

पता था और इस लिए वो कोई बेवकूफी नहीं करना चाहता था. उसने बड़ी चालाकी से अपनी छाती खुजाने के लिए

अपनी उल्टी कोनी उपर करी और हल्के से ललिता के सीधे स्तन को छु लिया. ललिता कुच्छ नहीं बोली क्यूंकी उसको चंदर की चाल चाल समझ आ गयी थी मगर वो ये देखना चाहती थी कि ये लड़का कितनी दूर तक जाता है और इसलिए वो चंदर से थोड़ा दूर जाके खड़ी हो गई. चंदर को लगा कि ललिता को उसकी ये हरकत पसंद नही आई इस वजह से घबरा गया....

फिर भी उसने हार नहीं मानी वो दबे पाओ ललिता की तरफ बढ़ गया. अब चंदर ने बड़ी हिम्मत दिखाकर अपनी

उंगलिओ से उसकी कमर को छुआ. ललिता ज़रा सा भी नहीं हिली. चंदर कमर को छुता छुता अपनी उंगलिया बढ़ाने लगा और ललिता के पेट पे हाथ रख दिया. इस बारी ललिता ने उसका हाथ हटा दिया और पर्दे के बाहर चली गयी. चंदर इस

बारी काफ़ी डर गया और उसने सोचा अब शायद ललिता से आँख मिलाने में भी उसको शरम आएगी. उधर ललिता चंदर की इस हरकत से काफ़ी खुश थी. वो चाहती थी कि चंदर उसको हिम्मत दिखाए क्यूंकी उसको फत्तु लड़के बिल्कुल पसंद नही थे...

क्रमशः……………………….


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